अध्याय 182

कैट्निस झाड़ियों की ओट में दुबकी हुई थी, कमर तक ऊँची जंगली घास को ढाल की तरह इस्तेमाल करते हुए। ठंड और डर से उसका शरीर बुरी तरह काँप रहा था। वह चट्टान की दीवार के एक गड्ढेनुमा हिस्से में सिकुड़कर गोला बन गई, मन ही मन चाहती हुई कि काश वह पत्थर में ही समा जाए।

भेड़िया फिर नहीं हुआँका, मगर दहशत वहीं थ...

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